आज भी जब इस किस्से को याद करता हूँ तो मेरी पेंट गीली हो जाती है  

मैं आप लोगों को एक ऐसा किस्सा बताने जा रहा हूँ | जो शायद आप में से किसी के साथ भी हुआ हो | मैं अपने शहर से 90 किलोमीटर दूर एक पॉलीटेक्निक कॉलेज में इंजीनिरिंग कर रहा था | मैंने हॉस्टल नहीं लिया था | क्यूंकि मैं कभी भी घर से दूर कहीं रहा नहीं | इसी लिए मुझे हर रोज अपने शहर के लिए उप डाउन करना पड़ता था | मेरे लिए सही था | मुझे अच्छा लगता था | बेशक मेरा सारा दिन ऐसे ही चला जाता था | दो घंटे हर रोज जाने के लिए और आने के लिए लगते बाकी का समय कॉलेज में गुजर जाता | 

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वैसे तो मैंने सरकारी बस का पास बनवा रखा था लेकिन कभी-कभी मैं प्राइवेट बस में भी आ जाता था | पास चला देते थे | जिस टाइम मैं अपने शहर के लिए बस पकड़ता था उस टाइम बस स्टैंड में बहुत भीड़ होती थी | क्यूंकि यह टाइम सभी कॉलेज और स्कूल की छूती का टाइम होता था | तो सभी स्टूडेंट अपने घर जाने के लिए जल्दी में होते थे और इस टाइम हर एक बस में भीड़ होती थी | मुझे लगभग हर रोज अपने शहर को जाती बस में इस भीड़ का सामना करना पड़ता था | 

सीट पे बैठ नहीं सकते थे क्यूंकि कंडक्टर उठा देता था कि तुम स्टूडेंट हो खड़े होकर जाओ और सवारी को बैठने दो | इसीलिए दो घंटे का सफर मुझे खड़े होकर ही करना पड़ता था | लेकिन एक दिन मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ की मुझे बस में खड़े रहने की आदत हो गयी | मुझे अब बस में खड़े होकर जाने में मज़ा आता है | 

हुआ क्या मैंने बस स्टैंड से बस पकड़ी, बस में भीड़ बहुत थी तो मैं अपनी जगह पे खड़ा था | बस के बीचो-बीच | मेरी एक आदत थी की मैं बस में तीन सीट वाली सीट के तरफ पीठ करके और उसका सहारा लेके खड़ा हो जाता था | इससे एक तो खड़ने में आसानी होती और दूसरा जब ड्राइवर ब्रेक लगता था तो झटका कम लगता था | गिरने का खतरा नहीं रहता था |  इसके इलावा मैं छत पे लगे हुए डंडे को पकड़ा के रखता था और एक हाथ में किताबें होती थी | लेकिन उस मेरे पास बस एक कॉपी ही थी जो मैंने अपनी जीन्स की पिछली पॉकेट में डाल ली | भीड़ इतनी ज्यादा थी के कोई भी अपना पैर एक जगह से उठा के दूसरी जगह नहीं रख सकता था | 

बस में थोड़ी बहुत जगह तब बनती है जब कंडक्टर टिकट काटने आता है | तब वो सभी को एक बार अपनी जगह से हिलाता है | उस दिन भी ऐसा ही हुआ जब कंडक्टर टिकट काटने आया तो मैं अपनी जगह से थोड़ा आगे चला गया | आगे क्या चला गया मेरी तो ज़िंदगी बन गया | आगे वाली सीट के पास एक लड़की खड़ी थी, वो दो सीट वाली सीट की तरफ अपना मुँह करके और मेरी तरफ अपनी पीठ करके खड़ी थी | जब कंडक्टर ने मुझे आगे धकेला तो मैं सीधा उस लड़की की पीठ के साथ लग गया | बिलकुल जैसे साथ में हो चिपका हूँ | वो लड़की शायद डॉक्टरी की study करती थी क्यूंकि उसने white कोट डाला हुआ था | उसकी गांड इतनी मोटी थी और वो भी गोल-गोल | उसका फिगर पूरा मस्त था | वो slim नहीं थी | उसका पूरा शरीर अच्छे से मॉस से भरा हुआ था | जैसे कोई बेड का गद्दा हो | 

मैं जब उस लड़की की पीठ के साथ चिपका तो मेरा औज़ार सीधा उसकी मोटी-मोटी गांड के सेण्टर में चला गया | सेंटर में जाते ही औज़ार ने अपना काम करना शुरू कर दिया | एक-दो मिनट की ही बात थी मेरा औज़ार पूरा खड़ा हो चूका था और उस लड़की की गांड में पूरी तरह सेंटर में लग चूका था | जैसे किसी गाडी को उठाने के लिए जैक का इस्तेमाल किया जाता है | 

इतनी भीड़ होने के बावजूद किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कौन कहाँ खड़ा है | क्यूंकि जगह ही नहीं थी कहीं और खड़ने की | ड्राइवर ने दो-तीन बार ब्रेक लगाये तो मेरा औज़ार उसकी गांड को tocuh करने लगा | मेरी अच्छी किस्मत उस लड़की ने स्टेचेवल लेगी और टॉप पहना हुआ था जिसकी वजह से मेरा औज़ार उसकी गांड के सेंटर में लग गया था और उसकी चूत को भी छु रहा था | 

मुझे डर था कि कहीं मेरा औज़ार उस विचारी की लेगी को फाड़ के न अंदर घुस जाए | माहौल ही कुछ ऐसा था | ऐसा हो भी सकता था | मुझे इतना मज़ा पहले कभी नहीं आया | वाबजूद इसके के मेरा औज़ार पूरी तरह से उसकी गांड जा उसकी गुफा में भी नहीं घुसा था | लेगी बीच में थी लेकिन फिर भी उसकी मोटी गांड होने के कारन, उसके बीच में औज़ार फसा हुआ था | और बस हिल्ती जा रही थी और मेरा औजार भी हिलता था तो मुझे तो पूरा मज़ा आ रहा था | उस लड़की को आ रहा था जा नहीं यह मुझे पहले पता नहीं चला लेकिन जब वो लड़की मुझे पीछे की तरफ अपनी गांड से धकेलने लगी तब मुझे पता चला कि यह लड़की भी पूरे मूड में आ चुकी है | जब भी सड़क पर कोई छोटा-मोटा गद्दा आता तो बस हिलती लेकिन वो लड़की उससे भी ज़्यादा ज़ोर से मुझे पीछे की तरफ धक्का दे देती | जैसे हम कहीं अकेले में मजा कर रहे हों और वो धक्के पे धक्के दे रही हो और मजे ले रही हो | अब मुझे कुछ करने की जरूरत नहीं थी | मैं तो बस खड़ा था | अब सारा काम वो लड़की ही कर रही थी | 

जब बस आराम से चलती तो वो अपनी मोटी गांड को धीरे-धीरे से गोल-गोल घुमाती | और जब ब्रेक पड़ते जा गड्डा आता तो वो धक्का देती | मैंने सोचा के यार यह तो बहुत अच्छा है | मैं ऐसे ही परेशान होता रहता था की बस में खड़े होकर जाना पड़ता है | खड़े  होने का तो मज़ा ही बहुत है | 

सबसे जबरदस्त बात यह थी की उस लड़की ने मुझे देखा तक नहीं था और न ही मुझे उसका चेहरा नज़र आ रहा था | बस हमारा तो प्रोजेक्ट चल रहा था और हम दोनों मजे ले रहे थे वो भी लोगों से भरी हुयी बस में, आराम से खड़े होकर | 

हमारा यह प्रोजेक्ट लगभग आधा घंटा चला उसके बाद मुझे और मज़ा आने लगा फिर मैंने धक्के मारने शुरू कर दिए, जैसे मैं उसे नंगी करके पेल रहा हूँ | अब वो खड़ी हो गयी और मेरा काम चालु हो गया | मैं धीरे-धीरे धक्के देता गया और मजे लेता गया | जब मैं धक्का देता तो वो अपने पैर जमा लेती ताकि उसे थोड़ा सा भी आगे न होना पड़े और मेरा औज़ार पूरी तरह से उसकी मोटी गांड को टच करे | पंद्रह-बीच मिनट के बाद मैं अब चरमसुख की प्राप्ती करने वाला था | मेरी स्पीड थोड़ी तेज हो गयी और अगले ही पल मैं झड़ गया | मेरा तो पेंट में ही काम तमाम हो गया | झड़ने के बाद मैं रुक गया | और आराम से खड़ा हो गया | अब वो लड़की को लगा कि शायद मैं थक गया हूँ | अब उसने अपना काम चालू कर दिया | अब वो मुझे पीछे की तरफ धक्के मारने लगी | लेकिन मैं तो  झड़ गया था, जिसकी वजह से मेरा औज़ार भी ढीला होता जा रहा था | और अब मुझे अच्छा भी नहीं लग रहा था | अब मुझे ऐसा लग रहा था की यह लड़की मेरे से दूर होकर खड़ी हो जाये लेकिन शायद वो भी चरमसुख की प्राप्ती करने ही वाली थी इसीलिए वो मुझे धक्के पे धक्का दे रही थी | मैंने अपने दायीं कोहनी से उसे आगे की तरफ धकेलना शुरू कर दिया लेकिन वो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी | जब काफी समय के बाद भी वो नहीं रुकी तो मैंने अपना मुँह उसके कान के पास किया और बोला, "बस कीजिये मैं झड़ गया हूँ" | यह बात सुनते ही वो लड़की को पता नहीं क्या हो गया शईद वो डर गयी जा उसने मेरी बात मान ली, जा शायद उसे लगा की इसकी पेंट खराब हो  गयी है कहीं मेरी भी लेगी खराब न हो जाये | 

अब उसने अपनी गांड मेरे औजार के पास से हटा ली और मुझे भी थोड़ी शांति मिली | लेकिन समस्या तो मेरे साथ ही थी मेरी पेंट जो गीली हो चुकी थी | अगर कोई देख लेगा तो समझेगा मैंने पिशाब कर दिया है | मैं अपनी शर्ट बाहर निकाली और गीली हुयी जगह को ढक लिया | अभी बस आधे रस्ते ही पहुंची थी अगले ही स्टॉप पे मैंने उतरने का फैसला कर लिया | बस रुकी और मैं उतर गया लेकिन वो लड़की बस में ही थी शायद उसने मुझे देख लिया हो लेकिन मैंने उसे नहीं देखा | उतर कर मैंने सबसे पहले वाशरूम देखा और उसमें जाकर मैंने अंदर से सारा कुछ साफ़ किया और धो-धाकर मैंने अगली बस पकड़ी | 

यह किस्सा मेरी ज़िंदगी का बहुत ही खूबसूरत किस्सा था | जो मुझे आज दस सालों के बाद भी हूबहू याद  है | हर एक चीज, कुछ किस्से ऐसे ही होते हैं, जो आपके ज़ेहन में हमेशा की तरह बैठ जाते हैं | जो कभी भुलाये नहीं  जाते या यह कहलो के भूलने का मन नहीं करता | आज जब इस किस्से को याद करता हूँ तो अपनी पेंट गीली होने का एहसास होता है |